Wednesday, September 4, 2019

शिक्षक दिवस 2019: देश की पहली महिला शिक्षक, जिनकी जिद ने शिक्षा की तस्वीर बदल दी

देश की पहली महिला शिक्षिका सावित्री बाई फुले एक मिसल बनकर आज भी हमारे दिल में जिंदा हैं। उनका नाम सामने आते ही सिर फ्रा से ऊंचा उठा जाता है। शिक्षा में अतुलनीय योगदान के लिए देश और समाज सावित्री बाई फुले का सदैव ऋणी रहेगा। जिस समय फुले ने शिक्षा की जोत जलाई उस समय लड़कियों को शिक्षा से वंचित रखा गया था, इसके बावजूद भी उन्होंने नारी शिक्षा के बीड़े को अंजाम तक पहुंचाया तोोपरांत समाज से कुंठित वर्ग की नारियां भी शिक्षा करने के लिए आगे आने लगीं। बात 19 वीं सदी की है, जब स्त्रियों के अधिकारों, अशिक्षा, छुआछूत, सतीप्रथा, बाल या विधवा-विवाह जैसी कुरीतियों पर किसी भी महिला की आवाज नहीं उठती थी। परमित्री बाई फुले ने उस वक्त अपनी आवाज उठाई और नामुमकिन को मुककिन करके दिखाया।

कौन थे सावित्रीबाई फुले-
जनवरी 1831 में महाराष्ट्र के सतारा जिले में स्थित नायकगाँव को छोटे से गांव में सावित्रीबाई फुले पैदा हुए थे। उनकी शादी 9 साल की उम्र में ही ज्योतिबा फुले के साथ हो गई थी। बता दें कि जब उनकी शादी हुई थी तब वह अनपढ़ थी। अगर उनके पति की बात की जाए तो वे तीसरी कक्षा तक पढ़े थे।
सावित्रिबाई का सपना उच्च शिक्षा ग्रहण करना था। पर उस वक्त दलितों के साथ काफी अंतर-भाव होता था। उस वक्त की एक घटना याद आती है, एक दिन फुले को अंग्रेजी की किताबों के पन्ने पलटते हुए उनके पिताजी ने देख लिया। सावित्री के पास आए और किताब छीनकर बाहर फेंक दी। सावित्री को समझ नहीं आया। उन्होंने अपने पिताजी से जब कारण पूछा तो उन्होंने कहा कि पढ़ाई करने का हक केवल उच्च जाति के पुरुषों का है। उस वक्त दलितों के साथ महिलाओं के लिए भी पढ़ाई करना पाप था। इस घटना के बाद उन्होंने कुछ किया हो वह भी शिक्षा जरूर लेंगी।

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